लघु प्रेरक प्रसंग कहानियाँ | 10+ Prerak Prasang Kahaniya

लघु प्रेरक प्रसंग कहानियां: हिंदी में ये लघु कथाएँ हमें जीवन में सफलता के कुछ मूल मंत्र के बारे में बताती हैं। हमें विश्वास है कि ये प्रेरक प्रसंग एक नया जोश भरेंगे और साथ ही साथ आपकी सफलता के रास्ते में आने वाली सभी कठिनाइयों को दूर करेंगे।

प्रेरणादायी लघु कहानियाँ (प्रेरक प्रसंग – Prerak Prasang Kahaniya) जो आपके जीवन को बदल सकती हैं। दोस्तों, जो जीवन में कुछ पाना चाहते हैं, उन सभी के लिए प्रेरक विषय बहुत उपयोगी साबित होते हैं। यह हमें प्रेरित करते हैं क्योंकि कई बार जब तक हमारे जीवन में कोई प्रेरक प्रसंग नहीं होता, हम आगे नहीं बढ़ पाते हैं या सफल नहीं हो पाते हैं।

बहुत से लोगों में आत्म-प्रेरणा होती है। जबकि कुछ लोग बाहरी प्रेरणा, प्रेरक विषयों के माध्यम से अपने लक्ष्यों को प्राप्त करते हैं। आज हम आपके लिए ऐसी प्रेरक प्रसंग कहानियां लाए हैं, जिन्होंने मेरे जैसे हजारों लोगों के जीवन में एक बड़ा बदलाव लाया है।

Prerak Prasang – लघु प्रेरक प्रसंग कहानियां

प्रेरक प्रसंग #1 – अडिगता पर एक बच्ची का प्रसंग

prerak prasang kahani in hindi
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एक बार पाँच-छह साल की एक लड़की डेढ़ साल के तन्दुरूस्त लड़के को गोद में लिए खेत से घर की ओर जा रही थी। चार कदम चलती थी और बच्चे को गोद से उतारकर पसीना पोंछने लगती थी।

एक युवा ने आगे बढ़कर पूछा-“भारी है?”

लड़की ने बच्चे को गोद में सहेजते-समेटते हुए कहा-“भारी नहीं भाई है।”

उस युवा को लड़की की बात बहुत अच्छी लगी और उसने इस घटना को अपनी डायरी में कलमबद्ध कर दिया। कालांतर में ये युवा कथाकार सदर्शन के नाम से प्रख्यात हुए। इनकी ‘हार की जीत’ कहानी अत्यंत प्रसिद्ध है।


प्रेरक प्रसंग #2 – हस्तरेखा

राज ज्योतिषी ने राजा वसुसेना की श्रद्धा ज्योतिष पर बहुत जमा दी थी। वे बिना मुहूर्त जाने कोई काम ही नहीं करते थे शत्रुओं को पता चला तो वे ऐसी घात लगाने लगे कि किसी से मुहूर्त में हमला करें, जिसमें प्रतिकार का मुहूर्त न बने और वसुसेना को सहज ही परास्त किया जा सके। प्रजाजन और सभासद सभी को राजा के इस कुचक्र में फंस जाने पर बड़ी चिंता होने लगा.

संयोगवश राजा एक बार देश के दौरे पर निकले। साथ में राज-ज्योतिष भी थे। रास्ते में एक किसान मिला, जो हल-बैल लेकर खेत जोतने जा रहा था। राज ज्योतिषी ने उसे रोककर कहा-“मुर्ख जानता नहीं, आज जिस दिशा में दिशाशूल है, उसी में चला जा रहा है। ऐसा करने से भयंकर हानि उठानी पड़ेगी।”

किसान दिशाशूल के बारे कुछ नहीं जानता था। उसने नम्रतापूर्वक कहा-“मैं तो प्रत्येक दिन इसी दिशा में जाता हूं। उसमें दिशाशूल होने वाले दिन भी होते होंगे। यदि आपकी बात सच होती तो मेरा कब का सर्वनाश हो गया होता।”

ज्योतिष सिटपिटा गये। झेंप मिटाने के लिए बोले-“लगता है तेरी कोई हस्तरेखा बहुत प्रबल है, दिखा तो अपना हाथ।”

किसान ने हाथ तो बढ़ा दिया, किन्तु हथेली नीचे की ओर रखी। ज्योतिषी इस पर और अधिक चिढ़े और बोले-” मेरा! इतना भी नहीं जानता कि हस्तरेखा दिखाने के लिए हथेली ऊपर की ओर रखनी होती है।”

किसान मुस्कुराया और बोला-“हथेली वह फैलाए, जिसे किसी से कुछ मांगना हो, जिन हाथों की कमाई से अपना गुजारा करता हूँ, उन्हें क्यों किसी दूसरे के आगे फैलाऊँ। मुहूर्त तो वह देखे जो कर्महीन और निट्ठला हो। यहाँ तो 365 दिन ही पवित्र है।’

ज्योतिषी महाराज कुछ समझे यह तो हमें पता नहीं, लेकिन कथा में आगे है कि महाराज वसुसेना को सद्बुद्धि अवश्य आ गयी थी और उन्होंने हर राज के हर कार्य से आत्मिक संबंध बना लिया था। राजकोट में शुभ मुहूर्त देखने की परंपरा छोड़कर बाद में अपना सारा राज्यकाल हर पल जनता की सेवा में ही गुजारा।


प्रेरक प्रसंग #3 – घमंड मत करो

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घमंड मत करो – prerak prasang in hindi

सन्त च्वांगत्सु एक अन्धेरी रात में मरघट से गुजर रहा था। वह मरघट शाही खानदान का था। अचानक उसका पैर एक आदमी की खोपड़ी पर लग गया। च्वांगत्सु फकीर घबरा गया। उसने वह खोपड़ी उठायी और घर लाकर उसके आगे हाथ-पांव जोड़ने लगा कि मुझे क्षमा कर दो। उसके मित्र इकट्ठे हो गये और कहने लगे,”पागल हो गये हो, इस खोपड़ी से क्षमा मांगते हो?”

च्वांगत्सु ने उत्तर दिया,” यह बड़े आदमी की खोपड़ी है। यह सिंहासन पर बैठ चुकी है। मैं क्षमा इसलिए मांगता हूं क्योंकि यह आदमी आज जीवित होता और मेरा पैर उसके सिर पर लग जाता तो पता नहीं मेरी क्या हालत बनाता? यह तो सौभाग्य है, यह आदमी जीवित नहीं है, लेकिन क्षमा मांग ही लेनी चाहिए।”

मित्रों ने कहा, तुम बड़े पागल हो।”

च्वांगत्से ने कहा, मैं पागल नहीं हूं। मैं तो इस मरे हुए आदमी से कहना चाहता हूं कि जिस खोपड़ी को तू सोचता था, सिंहासन पर बैठी है वही लोगों की, एक फकीर की ठोकर खा रही है और ‘उफ’ भी नहीं कर सकती। कहां गया तेरा सिंहासन? कहाँ गया तेरा अहंकार?”

कितना अच्छा जवाब था च्वांगत्सु का! आदमी को कभी भी पद और नाम का घमण्ड नहीं करना चाहिए।

इस संसार में हर कोई सात्विक प्रवृत्ति का इंसान नहीं है, तामसिक विचारों वालों की भी कमी नहीं। तामसिक विचार से पीड़ित व्यक्ति किसी की भी उन्नति से खुश होने की बजाय दुःखित होते रहे हैं और कोई-न-कोई नुक्स निकालकर आलोचना करते रहते हैं.

अपनी आलोचना या निंदा सुनकर आवेश में नहीं आना चाहिए, बल्कि यह विचार करना चाहिए अमुक ने मेरी निंदा या आलोचना किन कारणों से की? उन कारणों को समाप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए और आलोचना करने वाले को गाली-गलौज की बजाय धन्यवाद देना चाहिए, कि शुक्रिया आपने मुझे मेरी गलती का अहसास करा दिया। गलतियों और आलोचनाओं को स्वीकार करने का विचार ही सकारात्मक सोच को जन्म देता है।


प्रेरक प्रसंग #4 – आलसीपन

सुन्दरलाल एक धनी व्यापारी था। इसलिए नौकर-चाकरों की तो कमी थी नहीं। धीरे-धीरे उसने अपना सारा कार्य नौकरों पर ही छोड़ दिया और खुद कामचोर और आलसी बन बैठा। सुबह देर तक सोना उसे बहुत पसंद आने लगा।

अपने आलसी स्वभाव के कारण धीरे-धीरे सुन्दरलाल की सेहत बिगड़ने लगी। वह पलंग पर पड़ा-पड़ा मोटा हो गया। उससे अब ज्यादा चला-फिरा नहीं जाता था। उसने अब अपने सारे काम नौकरों पर छोड़ रखे थे। नौकर अपने मालिक के आलसी स्वभाव से परिचित हो गये थे। उन्होंने भी धीरे-धीरे बेईमानी करनी शुरू कर दी और इससे सुन्दरलाल को व्यापार में नुकसान होने लगा।

एक दिन सुन्दरलाल का मित्र उससे मिलने आया। सुन्दरलाल ने अपने मित्र से अपनी बीमारी के बारे में बताया। मित्र होशियार था, वह तुरन्त समझ गया कि सुन्दरलाल का आलसीपन ही सारी बीमारी की जड़ है। उसने सुन्दरलाल से कहा-“तुम्हारी बीमारी को दूर करने का उपाय मैं जानता हूँ, पर तुम वह कर नहीं सकते, क्योंकि उसके लिए तुम्हें जल्दी उठना पड़ेगा।”

सुन्दरलाल ने कहा कि वह बीमारी से ठीक होने के लिए सब कुछ करने को तैयार है।

मित्र ने कहा-” सुबह-सुबह अक्सर एक सुनहरा पक्षी आता है। तुम अगर उसे देख लो तो तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।” सुन्दरलाल अगले दिन सुबह-सुबह उठकर सुनहरे पक्षी को खोजने चल पड़ा।

रास्ते में उसने देखा कि नौकर उसी के भण्डार से अनाज चोरी कर रहे है। ग्वाला दूध में पानी मिला रहा है। सुन्दरलाल ने अपने सभी नौकरों को डांटा।

अगले दिन फिर सुन्दरलाल सुनहरे पक्षी की खोज में निकला। सुनहरे पक्षी को तो मिलना नहीं था, पर अपने मालिक को रोज आते देख भण्डार से चोरी होनी बंद हो गयी। सभी नौकर अपना काम ठीक से करने लगे। चलने-फिरने से सुन्दरलाल का स्वास्थ्य भी ठीक रहने लगा।

कुछ समय बाद सुन्दरलाल का मित्र वापस उसके पास आया।

सुन्दरलाल ने मित्र से कहा-“मित्र, मैं इतने दिनों से सुनहरे पक्षी को खोज रहा हूँ, पर वह मुझे दिखाई नहीं दिया।”

मित्र ने कहा-“तुमने जब से खेतों में जाना शुरू किया है, तुम्हारे यहाँ चोरी बंद हो गयी और तुम्हारा स्वास्थ्य भी ठीक हो गया। सुनहरे पक्षी को देखने के लालच में तुम्हारे अंदर अपने कार्यों से साहचर्य संबंध स्थापित हो गया। यह साहचर्य संबंध ही तो वह सुनहरा पक्षी है।”

मित्र की बात सुन्दरलाल की तो समझ में आ गयी। लेकिन आपकी… यह तो आप ही जाने, पर हम इतना अवश्य जानते हैं कि जब तक आप सुन्दलाल की तरह प्रतिदिन अपने कार्यों को स्वयं नहीं देखेंगे, तो निरन्तर लाभांश की कामना करना बेमानी होगी। इसमें कोई शक नहीं कि आप आलसी नहीं हैं.

लेकिन थोडी और मेहनत और बस थोड़ी और…. इस प्रकार आप साहचर्य संबंध बनाकर अपने उद्योग को आगे बढ़ाकर न केवल स्वयं आगे बढ़ेंगे, बल्कि अपने कर्मचारियों को भी आगे बढ़ाने में मदद करेंगे। उनके लिए प्रेरणास्रोत बनेंगे और किसी ने कहा है, कर भला तो हो भला।


प्रेरक प्रसंग #5 – राजा मणीन्द्र चन्द्र नन्छी

बंगाल में गुष्करा एक छोटा-सा स्टेशन है। एक दिन रेलगाडी आकर स्टेशन पर खड़ी हुई। उतरने वाले झटपट उतरने लगे और चढ़ने वाले दौड़-दौड़कर गाड़ी में चढ़ने लगे। एक बुढ़िया भी गाड़ी से उतरी। उस वृद्धा मातृशक्ति ने गठरी खिसकाकर बोगी के दरवाजे पर तो कर ली, किन्तु बहुत चेष्टा करके भी उतार नहीं पायी थी। कई लोग उसकी पोटली को लांघते हुए डिब्बे से उतरे और चढ़े भी, पर किसी ने उसकी मदद नहीं की।

उस वृद्धा ने कई लोगों से बड़ी दीनता के साथ कहा भी कि वे मेरी गठरी उसके सिर पर रख दें, लेकिन आज की आपाधापी के युग में भला कौन किसी की मदद करने लगा। लोग तो ऐसे जा रहे थे जैसे कि बहरे हों या फिर वह बुढ़िया पागल हो। अचानक ही गाड़ी ने चलने के लिए सीटी बजा दी।

बुढ़िया ने देखा कि गाड़ी छूट रही है और उसकी पोटली नहीं उतर पायी तो वह बेचारी अत्यंत दु:खित हो गयी। उसकी आंखों से टपटप आंसू झरने लगे।

– लेकिन तभी!

एकाएक प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठे एक सज्जन की दृष्टि उस वृद्धा पर पड़ी। गाड़ी छूट चुकी थी, लेकिन फिर भी उसने गाड़ी की चेन खींची और और डिब्बे से शीघ्रता से उतरकर वृद्धा के पास आया| उसने वृद्धा की पोटली उठाकर उसके सिर पर रख दी और अपने डिब्बे की ओर चल दिया, लेकिन तभी उसे पुलिस सुरक्षा बल ने चेन खींचने के जुर्म में पकड़ लिया। उसने इस अपराध के लिए जुर्माना अदा कर दिया और फिर गाड़ी चल दी। बुढ़िया चलती गाड़ी को देखकर बार-बार उस सज्जन पुरुष को आशीर्वाद दे रही थी-“बेटा! भगवान् तेरा भला करें।”

आप जानते हैं कि उस वृद्धा की गठरी उठा देने वाला सज्जन कौन था?

नहीं जानते ना?

वे थे कासिम बाजार के राजा मणीन्द्र चन्द्र नन्छी, जो उस गाड़ी से कलकत्ते जा रहे थे। वे जनता की नजरों में राजा तो थे ही, लेकिन सचमुच भी राजा ही थे, क्योंकि सच्चा राजा वह नहीं है जो धनवान हो, जिसके पास राजपाट हो या फिर बड़ी सेना हो। सच्चा राजा तो वह है जो उदार हो, दीन-दु:खियों और दुर्बलों की सहायता करता हो। ऐसे सच्चे राजा बनने का अधिकार तुम सबको है। अपने इस अधिकार का पालन करना चाहिए।


प्रेरक प्रसंग #6 – देवी लक्ष्मी vs दरिद्र देवी

एक बार धन की देवी लक्ष्मी और गरीबी की देवी दरिद्र देवी में झगड़ा हो गया। लक्ष्मी जी का कहना था कि वह ज्यादा सुंदर है और लोग उन्हें ज्यादा चाहते हैं। दरिद्र देवी का कहना था कि वह ज्यादा सुंदर है।

दोनों के बीच हो रही बहस का कोई हल नहीं निकल रहा था, इसलिए दोनों देवियों ने फैसला किया कि धरती पर चलकर जो पहला आदमी नजर आये उसी से झगड़े का फैसला करवाया जाये। दोनों धरती पर आयीं। धरती पर उन्हें एक किसान दिखायी दिया।

दोनों किसान के पास अपनी समस्या लेकर पहुंची और उससे कहा कि जब तक वह समस्या का हल नहीं निकालता, तब तक उसे कहीं नहीं जाने दिया जायेगा। बेचारा किसान बड़ी मुश्किल में फंस गया। किसान जानता था कि उसने अपना फैसला लक्ष्मी के पक्ष में सुनाया तो दरिद्र देवी नाराज होकर उसका पीछा नहीं छोड़ेगी और अगर उसने दरिद्र देवी को ज्यादा सुंदर बताया तो लक्ष्मी जी उससे रूठकर उसे छोड़ जायेंगी।

किसान समझ गया कि दोनों देवियों में से किसी को भी नाराज नहीं किया जा सकता। उसने कुछ देर सोचकर दोनों को जवाब दिया-“देवियों! असल में तुम दोनों ही इतनी सुंदर हो कि मैं किसी एक के पक्ष में फैसला नहीं दे सकता।

दरिद्र देवी जब आप किसी के घर से बाहर जाती हो तब आपसे ज्यादा सुंदर और कोई नजर नहीं आता और लक्ष्मी जब आप किसी के घर आती हो, तब आपसे ज्यादा सुंदर और कोई नहीं होता।” दोनों देवियां अपनी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न हो गयीं और खुशी-खुशी वापस चली गयीं। दोनों को जाते देख किसान भी खुशी खुशी अपने घर चला गया।

आपको भी उस किसान की तरह ही समझ-बूझ का परिचय देना चाहिए। आपने कई बार स्वयं अनुभव किया होगा कि किसी कार्यक्षेत्र में दो लोगों में झगड़ा हो जाता है, लेकिन उनसे भी जूनियर समझ-बूझ का परिचय देते हुए सुलह-मशविरा करा देता है। इसलिए समझ-बूझ को पद-प्रतिष्ठा, ऊंच-नीच से नहीं नापा जा सकता। एक सफाई कर्मी भी किसी अधिकारी से ज्यादा समझदार हो सकता है। लेकिन ऐसे ही लोग कुछ कर दिखाने में कामयाब होते हैं।


प्रेरक प्रसंग #7 – सात्विक आहार

सात्विक आहार के संबंध में एक प्रेरक प्रसंग है- साहित्यकार संतराम गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में बी०ए० के छात्र थे। एक दिन भोजन कक्ष में भोजन करने बैठे

किसी भी कार्य को करने के लिए यदि सोच-समझकर कदम उठाओगे तो आपकी सकारात्मक सोच को और ज्यादा गतिशीलता मिलेगी और जब पॉजिटिव थिंकिंग को गतिशीलता मिलेगी, तो सफलता निश्चित रूप से आपके कदम चूमेगी।

और एक साथी से जान-बूझकर छू गये। वह भी भोजन कर रहा था। बस फिर क्या था, वह छात्र तो आगबबूला हो उठा।

अपनी थाली वहीं छोड़ते हुए बोला-“संतू मुझसे छू गया है। मेरी थाली का खर्च इसके नाम लिखना। दुष्ट कहीं का।”

संतराम ने अब तो उसकी बाँह पकड़ ली और वहीं बिठाकर कहा-“जरा अपनी यह क्रिस्टल टोपी उतारकर उल्टी रख।”

उसने टोपी उतारी तो पूछा-“यह इसके भीतर पट्टी किसकी है?”

वह बोला-“खाल की है।”

“तो क्या मैं इस टोपी में लगी मरी हुई खाल से भी ज्यादा अछूत हो गया हूँ, जो तू थाली छोड़कर भागता है? इस टोपी को तो सिर पर बिठाए घूमता है। जाओ, अब छोड़ दो थाली और भूखे मरो। मैं इस थाली का खर्च हर्गिज चुकाने वाला नहीं। भोजन में छूत-अछूत नहीं सात्विकता देखी जाती है। यदि भोजन सात्विक होगा तो तुम्हारे विचार भी सात्विक होंगे।”

और वह छात्र फिर भोजन करने बैठ गया। बाद में दोनों के बीच गहरी मित्रता हो गयी। संतराम का मित्र समझ गया था कि दरअसल भोजन की महत्ता उसके गुणों से है, न कि किसी के छूने या न छूने के कारण।


प्रेरक प्रसंग #8 – मीठा बोलें

vinoba bhave prerak prasang
Acharya Vinoba Bhave Prerak Prasang in Hindi

एक बार धार्मिक विषयों के मर्मज्ञ साहित्यकार भक्त रामशरण दास को विनोबा जी द्वारा लिखित गीता प्रवचन पढ़ने को मिला। रामशरणजी किसी भी पुस्तक को बड़े मनोयोग से पढ़ते थे और धर्मशास्त्रों का उन्हें अद्भुत ज्ञान था।

विनोबाजी के गीता प्रवचन में उन्हें एक अंश अप्रासंगिक और अप्रामाणिक लगा। ग्रन्थ में महर्षि वशिष्ठ के स्वागत में महर्षि वाल्मीकि द्वारा मधुपर्क में गौमांस खिलाने की बात लिखी थी। इस अंश को पुस्तक से निकलवाने के लिए उन्होंने विनोबाजी को अनेक पत्र लिखे। लेकिन उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला। अन्त में वे स्वयं ही विनोबाजी से मिलने जा पहुंचे।

मिलने का समय पाकर उन्होंने विनोबाजी से कहा-“मधुपर्क में गौमांस की बात अप्रामाणिक है। इसे पुस्तक में से निकाल दीजिए।”

विनोबा जी बोले-“हमने यह बात भवभूति के उत्तररामचरित के आधार पर लिखी है।”

भक्तजी ने जवाब दिया-“उत्तर रामचरितम धर्मशास्त्र नहीं है।”

विनोबा जी ने एक उदाहरण से अपनी बात समझाने की कोशिश की “मान लीजिए कि सन्तरे की एक फांक खराब है, तो उसे छोड़कर आप शेष सन्तरा तो खा सकते हैं।” लेकिन भक्तजी कब मानने वाले थे?

उन्होंने चट कहा-“लेकिन जब बाजार में अच्छे सन्तरे हों तो सड़ा हुआ सन्तरा ही लेने की क्या जरूरत है?” विनोबा जी अवाक् देखते रह गये।

कहने का मतलब है कि जब आपके अंदर अच्छे-अच्छे शब्दों का विशाल कोश मौजूद है तो फिर व्यर्थ शब्दों का इस्तेमाल क्यों करते हो? अच्छे शब्दों का इस्तेमाल जहां आपको उन्नति-पथ की ओर ले जाएंगा, वहीं भद्दे और दूसरों को मानसिक हानि पहुंचाने वाले शब्द न केवल द्वेष बढ़ाएंगे, बल्कि आपकी अपनी ही उन्नति में बाधक सिद्ध होंगे।

इसलिए बुरा सोचो मत, बुरा बोलो मत और बुरा लिखो भी मत बस यही उन्नति का मार्ग है। ऐसी ही सकारात्मक साच विकसित करो, फिर भला आपको आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है!


प्रेरक प्रसंग #9 – उचित विश्राम

दिन का समय था। मिर्जा गालिब ने शेरवानी उठाई और मस्जिद की ओर चल दिये। मार्ग में एक सायेदार वृक्ष देखा। वे सुस्ताने के लिए बैठ गये। शेरवानी एक टहनी पर लटका दी। थके-मांदे तो थे ही, झपकी आ गयी। उधर एक रात का शरीफ अर्थात् चोर आया। उसने देखा कि मुसाफिर बेखबर सोया पड़ा है, इसलिए शेरवानी उतारकर चलता बना।

मिर्जा की नींद खुली तो क्या देखते हैं कि कोई रात का शरीफ दिन में ही उनकी शेरवानी उड़ा ले गया। वे मुस्कुराये और बेसाख्ता उनके मुँह से निकल. गया

न लुटता दिन को तो कब रात में, मैं बेखबर सोता,

रहा खटका न चोरी का दुआ देता हूँ, रहजन को।

अर्थात् ईश्वर! तू चोर की उम्र लंबी कर, उसने मुझे दिन में लूट ही लिया है। अब कम-से-कम रात को तो पैर फैलाकर सोऊँगा। मिर्जा गालिब ने अपने नुकसान की चिंता नहीं की, बल्कि संतोष व्यक्त किया कि रात को आराम से विश्राम कर सकेंगे। जीवन में लाभ-हानि तो होते ही रहते हैं, वह सब अपनी जगह है, लेकिन विश्राम करना अर्थात् रात के समय सोना या कठिन परिश्रम के बाद थोड़ा विश्राम लेना। अपनी जगह रात्रि या थकावट के बाद की घड़ियां बनाई ही विश्राम के लिए हैं। इसलिए यदि उन्नति करनी है, तो मेहनत के साथ-साथ उचित निद्रा व विश्राम का भी आनंद लें। व्यर्थ की चिंताएं न करके अपने विश्राम के अधिकार को न खोएं।


प्रेरक प्रसंग #10 – बचत का महत्त्व

prerak prasang in hindi - bachat ka mahatva
Prerak Prasang in Hindi – bachat ka mahatva

एक बार प्रसिद्ध लेखक जान मुरे अपने लिखने के कार्य में व्यस्त थे। तभी दो महिलाएँ जन-कल्याण से संस्था के लिए उनसे चंदा माँगने आई। अपना लेखन कार्य बीच में छोड़ने के बाद जान मुरे ने वहाँ जल रही दो मोमबत्तियों में से एक को बुझा दिया।

यह देखकर उनमें से एक महिला बुदबुदाई, “यहाँ कुछ मिलने वाला नहीं है।” जान मुरे को जब उन महिलाओं के आने के उद्देश्य का पता चला, तो उन्होंने खुशी-खुशी से 100 डॉलर उन्हें दे दिये।

महिलाओं के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, उनमें से एक बोली-“हमें तो आपसे एक सेंट भी पाने की उम्मीद नहीं थी, क्योंकि आपने हमारे आते ही एक मोमबत्ती बुझा दी थी।”

जान मुरे ने उत्तर दिया, “अपनी इसी बचत की आदत के कारण ही मैं आपको 100 डॉलर देने में समर्थ हुआ हूँ। मेरे विचार से आपसे बातचीत करने के लिए एक मोमबत्ती का प्रकाश ही काफी है।”

महिलाएं बचत के महत्व को समझ चुकी थीं। महिलाएँ तो बचत के महत्व को समझ गयीं, लेकिन आप कब समझेंगे? जल्दी समझिए वरना देर हो जाएगी और फिर पछताने से कुछ नहीं होता जब चिड़िया खेत चुग जाती है।


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ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रेरक प्रसंग (2 प्रसंग)

  1. Prerak Prasang – स्वावलम्बन
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Real-life Inspirational Stories in Hindi (4 सच्ची प्रेरक प्रसंग कहानियाँ)

  1. Prerak Prasang – ठोस निर्णय लें – ( एक लोकप्रिय उपन्यासकार गुरुदत्त की कहानी)
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  3. Prerak Prasang – प्रेम संतुष्ट करता है – (सन्त च्वांगत्सु का प्रसंग)
  4. Prerak Prasang – स्नेहमयी व्यक्तित्व – (नार्वे की विख्यात लेखिका सिग्रिड अनसेट)

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  2. चश्मा और एक गाँव वाला
  3. हवा और सूरज
  4. जैसी करनी वैसी भरनी
  5. चतुर बीरबल
  6. सफेद गुलाब
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  10. दो मेंढक
  11. गाना गाने वाला दरियाई घोडा
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