उठो जागो – एक सीख देने वाली वैदिक कहानी

utho jaago - rishi trit story

बहुत प्राचीन काल की बात है जब हमारे देश में गायों को सबसे बड़ी संपत्ति समझा जाता था। जिस व्यक्ति के पास जितनी अधिक गायें होती. वह उतना ही सम्पन्न माना जाता था। त्रित ऋषि को गोधन प्राप्त करने और सम्पन्न होने की तीव्र इच्छा थी। एक दिन उन्हें इंद्र ने उतनी और वैसी गायें दी, जितनी और जैसी गायें वे चाहते थे एक-से-एक उत्तम गायें पाकर त्रित की खुशी का ठिकाना न रहा। वे उन सुंदर और दुधारू गायों के साथ वनों-उपवनों में विचरण किया करते, उन्हें भाव-भरी आँखों से देख-देख प्रसन्न होते।

त्रित ऋषि को ऐसा लगने लगा कि उन्हें संसार की सारी संपत्ति प्राप्त हो चुकी है। उनसे सुखी और कोई नहीं है। धीरे-धीरे गायों की देखरेख करने और उनके साथ रहने के सुख में वे संसार की बाकी चीजें भूलते चले गए। त्रित ऋषि भूल चुके थे कि इंद्र उन्हें किसलिए इतना मानते थे, मरुत उनके सहयोग के लिए क्यों तैयार रहते थे. सूर्य उन पर क्यों प्रसन्न रहते थे और वरुण से उनकी घनी मित्रता क्यों थी। गायों की शोभा और समृद्धि के आगे त्रित को अपना यज्ञ-ग्राम, तेज-पराक्रम और आश्रम भी भूल चुका था।

यहाँ तक कि उन्हें माँ के लाड़-प्यार और प्रेरणादायी वचन भी भूल गए थे। वे केवल गायों के बीच मगन रहते। वे अपने सारे सामाजिक एवं धार्मिक कर्तव्यों के प्रति उदासीन हो गए। उनके इस व्यवहार से आश्रम की व्यवस्था लड़खड़ा गई। पठन-पाठन आदि दैनिक कार्य ठप्प पड़ गए। अनेक आश्रम वासी छात्र, तपस्वी, आश्रम की देख-भाल करने वाले संरक्षक अन्यत्र चले गए। आश्रम उजाड़-सा हो गया।

आत्मविस्मृति की दशा में पहुँचे हुए त्रित की शक्ति क्षीण हो गई थी। त्रित में देह का बल तो था, पर देह के बल को मन का बल संचालित करता है इसलिए त्रित की देह का बल मन के बल के बिना व्यर्थ हो गया था। त्रित में मन का बल तो था, पर मन के बल को आत्मा का बल संचालित करता है। इसलिए त्रित के मन का बल आत्मा के बल के बिना व्यर्थ हो गया था। आत्म-बल के बिना मनोबल और देह-बल टिक नहीं पाते। इसी आत्म-बल को त्रित ऋषि विस्मृत कर चुके थे।

लुटेरों से भेंट

एक दिन जब सुदूर वन में त्रित अपनी गायों के साथ विचरण कर रहे थे, उन्हें सालावृकी नामक दैत्य के लुटेरे पुत्रों ने घेर लिया और कहा, “ये गायें हमारी हैं। हम इन्हें ले जाएँगे।” इस प्रकार की घटना के लिए त्रित तैयार नहीं थे उन्होंने विनयपूर्वक कहा “ऐसा मत कहो। ये गायें मेरी हैं, ये मेरे प्राणों के समान प्रिय हैं। इन्हें मझसे दूर मत करो। मेरे प्राण निकल जाएँगे।” उनके मुंह से असहाय के समान निकलती बातों को सुनकर सालावृकी के लुटेरे पुत्र हँस पड़े। उन्हें आशा नहीं थी कि त्रित इस तरह असहाय होकर गिड़गिड़ाने लगेंगे उनमें विरोध करने की क्षमता नहीं रहेगी।

वास्तव में डर तो उन लुटेरों के मन में था कि त्रित के तेज और पराक्रम से उन्हें लोहा लेना पड़ेगा, लेकिन आसक्ति और मोह के कारण जब त्रित आत्म-बल से रहित और बड़े कमजोर दिखे तो उन्हें और दुखी करने के लिए उनमें से एक ने गायों को निर्दयता से पीटना शुरू किया। गायें रुदन करती हुई भागने लगीं। उन्हें घेर कर रखने के लिए दूसरों ने भी प्रहार किए त्रित मर्माहत हो उठे। वह दीन-हीन की भाति बार-बार उन लुटेरों के आगे विनय करते रहे और उनकी दशा देखकर लुटेरे और अधिक उत्साहित होते गए।

अंत में लुटेरों ने त्रित को भी पकड़ लिया और उन्हें पास के एक कुँए में ढकेल दिया। त्रित का गोधन छिन चुका था और वे एक ऐसे कुँए में पड़े हुए थे जिसमें पानी नहीं था, उसमें चारों ओर अंधकार छाया हुआ था। उस कुए की दीवार पर घासें,लताएँ और पौधे उपजे होने के कारण उसमें सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँच पाता था। कुंआ बहुत गहरा था। उसमें दुर्गध भी फैली हुई थी।

उजाले से भरे संसार में रहनेवाले त्रित ऋषि घने अंधकार में डूब गए। धन-समृद्धि की आसक्ति और मोह के अंधकार में तो वे पहले ही डूबे हुए थे इस अंधकार में ही तो उन्होंने अपने सगे-संबंधियों और मित्रों को – अपने तेज-पराक्रम और आत्म-बल को भुला दिया था। उन्हें लगने लगा, भूख-प्यास और वहाँ की दुर्गंध से उनके प्राण अवश्य निकल जाएंगे। इस दशा में उनके सामने केवल मृत्यु का भय खड़ा हो गया था।

त्रित ने विचार किया, वे इस दशा में कैसे पहुँचे? धन-समृद्धि के मोह के कारण। गोधन उन्हें कैसे प्राप्त हुआ? इंद्र को युद्ध में उनके द्वारा दिए गए सहयोग के कारण। उन्हें इंद्र को सहयोग देने की क्षमता कैसे मिली? मरुत और वरुण की मित्रता के कारण। मरुत और वरुण उनके मित्र कैसे हुए? सूर्य की उपासना करने के कारण। उन्हें सूर्य की उपासना का ज्ञान कैसे मिला? माँ के प्रेरणादायी वचन और मार्गदर्शन के कारण।

आत्म विस्मृति से बाहर निकलना

त्रित को माँ की बहुत याद आने लगी। वे माँ के लिए व्याकुल हो उठे| उनकी आत्म विस्मृति दूर होने लगी उन्हें याद आया – मैं त्रित हूँ एक मंत्र द्रष्टा ऋषि। मेरी मेधा से चारों ओर ज्ञान का प्रकाश फैलता था। मेरे यज्ञ और स्तवन से दसों दिशाओं में शाति उत्पन्न होती थी। मेरा आश्रम कितना भरा-पूरा था। कितने वीर मेरे आश्रम की सुरक्षा और व्यवस्था में लगे रहते थे। वह मेरा आत्म-बल, वह मेरा तप-तेज, वह मेरा पौरुष-पराक्रम कहाँ चला गया?

हे ईश्वर! मैं किस मोह में पड़ गया और सब कुछ गँवा बैठा। पर, नहीं अब ऐसा नहीं होगा। मैं असहाय नहीं हो सकता। मैं निर्बल नहीं हो सकता। मैं विपन्न नहीं हो सकता। मैं वही अजेय त्रित हूँ जिसने त्रिशिरा को अपने तेज और पराक्रम से मार गिराया था।

त्रित ने देवताओं के गुरु बृहस्पति की स्तुति की। उनका आत्मबल जाग उठा। उन्होंने कुँए की दीवार पर उपजे मजबूत पौधों और लताओं का सहारा लिया। वे धीरे-धीरे प्रयलपूर्वक कुए से बाहर निकल आए।

कुँए से बाहर निकलने के बाद त्रित बिलकुल बदल चुके थे। उनमें कहीं मोह का अंधकार शेष नहीं था। वे अपने भूले हुए सगे-संबंधियों और मित्रों की आवश्यकता पहचान चुके थे। उन्हें अपने भूले हुए तेज और पराक्रम की याद आ चुकी थी।

सबसे पहले वे अपनी माँ के पास गए। उन्हें अपनी माँ के लाड़-प्यार में कोई अंतर नहीं दिखा। वे आश्रमवासी स्वजनों से मिले उन्हें आश्रमवासियों के स्नेह में कोई परिवर्तन नहीं दिखा। उन्हें सबके साथ मिलने-जुलने में बहुत अच्छा लग रहा था। उन्होंने आश्रम की व्यवस्था नए सिरे से सुदृढ़ की। जो आश्रमवासी आश्रम छोड़ कर चले गए थे, वे वापस आ गए। आश्रम हरा-भरा, संपन्न दीखने लगा।

कुछ दिनों बाद उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में सभी देवगण उपस्थित हुए। उनके प्रिय मित्र मरुत और वरुण तो आए ही इंद्र भी पधारे। उन्होंने सूर्य की पुन: उपासना की। सूर्य भी त्रित से प्रसन्न हुए। त्रित की माँ ने उनके उत्तम यज्ञ को देखा और उन्हें गले से लगा लिया।

लुटेरों की क्षमा याचना

त्रित के तेजस्वी स्वरूप को देखकर पुनः आश्रमवासियों में उत्साह और उल्लास छा गया। उनका मस्तक ऊँचा हो चुका था। उनकी छाती चौड़ी हो गई थी, उनकी भुजाएँ फड़कने लगीं थीं वे अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहने लगे। उनकी आत्म विस्मृति दूर हो चुकी थी। वे अपनी खोई हुई संपत्ति पाने के लिए जागरूक हो उठे।

उनके प्रयासों की भनक लगते ही सालावृकि के लुटेरे पुत्र भयभीत हो उठे। वे त्रित की गायों को लौटाने आए। उन्होंने त्रित से क्षमा माँगी। त्रित ने उन्हें क्षमा करते हुए कहा, “जब मैं अपने आप को ही खो चुका था – पूरी तरह आत्म विस्मृत हो चुका था तब क्या मेरा कुछ भी मेरे पास रह पाता? अच्छा हुआ कि आप लोगों ने मेरी आत्म विस्मृति को मिटा दिया और मैं अपने आत्म-बल, तेज-पराक्रम और कर्तव्यों को पहचान सका।”

आत्म विस्मृति खुली आँखों की गहरी नींद है। गहरी नींद में सोए हुए व्यक्ति की संपत्ति लुट जाए तो इसमें आश्चर्य क्या है। सब प्रकार से सम्पन्न और समृद्ध होने के लिए आत्म जागरण बहुत जरूरी है।

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Editorial Team

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