रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है?

रक्षा बंधन भारत में मनाए जाने वाले त्योहारों में एक प्रसिद्ध त्यौहार है। यह एक हिन्दू पर्व है. इसे भारत के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों में बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है. रक्षा बंधन को मनाने का ढंग देश के अलग अलग हिस्सों में अलग हो सकता है.

रक्षाबंधन का यह पावन त्यौहार भाई-बहनों के आपस के प्यार को दिखाने के लिए मनाया जाता है। रक्षा बंधन का अर्थ होता है ‘रक्षा का धागा’ यानी इस दिन बहन अपने भाई को राखी बांधती है और भाई अपनी बहन को उपहार देता और अपनी बहन की रक्षा करने की कसम खाता है। यह पर्व हिन्दू कैलेंडर के अनुसार श्रवण महीने के आखिरी दिन यानी पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।

rakshabandhan kyo manaya jata hai

Rakshabandhan Kyo Manaya Jata Hai?

रक्षाबंधन के पीछे बहुत सारी कहानियां जुडी हुई हैं. आज इस लेख में उन्हीं कहानियों का जिक्र किया गया है. हिन्दू पुराणों में ऐसी कई कहानियां पढ़ी जा सकती हैं.

1. इन्द्रदेव की कहानी

इस कहानी का उल्लेख भविष्य पुराण में मिलता है.

असुरों के राजा बलि ने जब देवताओं पर आक्रमण किया तब राजा इंद्र और देवताओं को बड़ा नुकसान हुआ था. देवताओं के राजा इंद्र जब राजा बलि को प्रास्त नहीं कर सके तब इंद्र की पत्नी सची को चिंता होने लगी तब वह अपनी इस समस्या को लेकर विष्णु जी के पास गई और इसका समाधान पूछा. तब प्रभु विष्णु ने सची को एक धागा दिया और कहा कि इसे अपने पति की कलाई पर बाँध देना. सची के धागा बांधने के बाद ही इंद्रदेव राजा बलि को युद्ध में हरा सका था.

प्राचीन समय में जब कोई राजा किसी युद्ध के लिए जाता था तब राजा और सैनिकों की बहनें और पत्नियाँ उनकी कलाई पर धागा बांधती थी, जिससे वे सभी सकुशल जीत हासिल करके वापिस घर लौट सकें.

2. माता लक्ष्मी और राजा बलि की कहानी

असुर सम्राट बलि भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था। बलि की इतनी भक्ति से खुश होकर, प्रभु विष्णु ने बलि के राज्य की रक्षा खुद करने का वचन दे दिया और रक्षा करनी शुरू कर दी। ऐसे में माता लक्ष्मी इस बात से अत्यधिक परेशान रहने लगीं, क्योंकि अब भगवान विष्णु वैकुंठ में नहीं रहते थे।

इसका निवारण करने के लिए लक्ष्मी जी ने एक ब्राह्मण महिला का रूप धारण कर लिया और बलि के महल में रहने लगी। बाद में, माता लक्ष्मी ने बलि को राखी बाँधी और उसे बदले में कुछ देने के लिए कहा। राजा बलि को यह नहीं पता था कि यह महिला कोई और नहीं बल्कि स्वयं मां लक्ष्मी थी, इसलिए राजा बलि ने उसे कुछ भी मांगने के लिए कह दिया और वचन दिया कि वो उनकी मांग को पूरा करेंगें।

तब माता लक्ष्मी ने बलि से अनुरोध किया कि वे विष्णु को वापिस वैकुंठ ले जाना चाहती हैं। राजा बलि ने माता लक्ष्मी से वादा किया था कि वह उनकी कोई भी मांग को पूरा करेंगें, इसलिए राजा बलि ने भगवान विष्णु से वैकुंठ लौट जाने का आग्रह किया और उन्हें वापिस लौटना पड़ा। इसी वजह से कई स्थानों पर राखी को ‘बलेव्हा’ भी कहा जाता है।

3. कृष्ण और द्रौपधी की कहानी

भगवान कृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिए शिशुपाल का वध करना पड़ा था. इस दौरान सुदर्शन चक्र से कृष्ण जी के अंगूठे को चोट लग गई थी, तब द्रोपदी ने अपने वस्त्र को एक कोने से फाड़कर भगवान कृष्ण के अंगूठे पर बाँधा था, जिससे उनका खून बहना रुक जाए.

भगवान कृष्ण द्रोपदी के इस कार्य से अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने द्रोपदी के साथ एक भाई होने का फर्ज निभाया और द्रोपदी से वादा किया कि वे समय आने पर उनकी मदद जरुर करेंगें.

और जब क्रीडा सभा में जब दुशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया तब भागवान कृष्ण ने अपना वादा निभाया और द्रोपदी की लाज बचाई थी.

4. संतोषी माँ की कहानी

ये सभी जानते हैं कि भगवान गणेश के दो पुत्र थे शुभ और लाभ. एक दिन ये दोनों भगवान गणेश के पास पहुंचे और उनसे कहा कि उनकी कोई बहन क्यों नहीं है. उन्होंने भगवान गणेश से आग्रह किया कि उन्हें एक बहन चाहिए. उसी समय नारद मुनि भी वहां आ गए और उनके द्वारा बाध्य किये जाने पर भगवान गणेश ने अपनी शक्तियों से माता संतोषी को उत्पन्न किया.

जिस दिन माता संतोषी की उत्पति हुई थी, उसी दिन को रक्षा बंधन की तरह मनाया जाता है क्योंकि शुभ और लाभ को उस दिन बहन मिल गयी थी.

5. यम और यमुना की कहानी

हिन्दू धर्म के प्रचलित एक लोककथा के अनुसार मृत्यु के देवता यम लम्बे समय तक अपनी बहन यमुना के पास नहीं गए थे, तब यमुना को इस बात से दुःख हुआ था.

उसके बाद गंगा के समझाने पर यम अपनी बहन यमुना से मिलने के लिए गए थे. यमुना अपने भाई को देखकर अत्यधिक प्रसन्न हुई थी और उन्होंने अपने भाई यम का बहुत ख्याल रखा था.

यम अपनी बहन का इतना प्यार देखकर जब उससे उसकी इच्छा पूछी तब यमुना ने कहा कि मुझे आपसे निरंतर मिलना है. तब यम ने अपनी बहन की इस इच्छा को पूरा करने के लिए यमुना को अमर कर दिया.

इतिहास में रक्षा बंधन का जिक्र

हमारे इतिहास में भी रक्षा बंधन से जुडी बहुत कहानियां हैं, उन्ही में से कुछ यहाँ पर बताई गयी है.

1. सम्राट सिकंदर और सम्राट पुरु

रक्षा बंधन के त्यौहार की जो सबसे प्राचीन कहानी मिलती है वह है 300 BC में सम्राट सिकंदर से जुडी कहानी. इस समय सिकंदर ने जब भारत पर अपनी पूरी सेना के साथ आक्रमण किया तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती था भारत का महान शासक पुरु. उस समय में भारतवर्ष में सम्राट पुरु का काफी बोलबाला था. सिकंदर जो आजतक कभी हारा नहीं था उसे सम्राट पुरु से लड़ाई करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था.

उस समय भारत में राखी का त्यौहार था और जब सिकंदर की पत्नी को इस त्यौहार के बारे में पता चला तो उन्होंने सम्राट पुरु को एक राखी भेजी और उनसे आग्रह किया कि वो सिकंदर को जान से ना मारें. तब सम्राट पुरु ने भी अपनी बहन का इच्छा पूरी की और सिकंदर पर हमला न करने का निर्णय लिया.

2. रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूँ

रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूँ की यह कहानी मध्यकालीन युग की है. उस समय राजपूतों और मुस्लिमों में काफी संघर्ष चल रहा था. राखी का त्यौहार उस समय भी काफी प्रचलित था. उस समय चित्तोड़ के राजा की विधवा रानी कर्णावती थी और वह अकेली अपने राज्य की रक्षा करने में असमर्थ थी.

उस समय सुल्तान बहादुर शाह ने उन पर हमला कर दिया. सुल्तान बहादुर शाह गुजरात के शासक थे. तब रानी ने अपने राज्य की रक्षा करने के लिए सम्राट हुमायूँ से राखी भेजकर मदद मांगी.

सम्राट हुमायूँ ने अपनी बहन की रक्षा के लिए अपनी सेना की एक टुकड़ी चित्तोड़ भेज दी जिससे सुल्तान बहादुर शाह को पीछे हटना पड़ा.

3. 1905 का बंग भंग और रवीन्द्रनाथ टैगोर

जब अंगेज भारत में सत्ता में थे तब ‘बाँटों और राज करो’ की पालिसी से भारत वासियों को तोड़ रहे थे. ऐसे समय में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लोगों में एकता बनाये रखने के लिए रक्षा बंधन का त्यौहार मनाया था. इस समय 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया था और हिन्दू और मुस्लिमों में फूट डालने की कोशिश की थी. ऐसे में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एकता बनाये रखने के लिए इस त्यौहार को मनाया था.